Last Update - 20 Apr 2020

‘स्टेट ऑफ सीज: 26/11’ आतंक के खौफनाक 60 घंटे, जांबाजी की अनकही दास्तान

‘स्टेट ऑफ सीज: 26/11’ आतंक के खौफनाक 60 घंटे, जांबाजी की अनकही दास्तान

कलाकार-मुकुल देव, अर्जन बाजवा,
अर्जुन बिजलानी,
विवेक दहिया आदि।
निर्देशक- मेथिऊ ल्युटवायलर

'साहस की विजय' हो इसी मंत्र के साथ बीते कुछ महीने से दुनिया कोरोना वायरस की महामारी का सामना कर रही है। साहस वो भाव है जो भीतर से आता है फिर चाहे वह इस वक्त घर में बैठकर आइसोलेशन में जाकर खुद के साथ सभी की सुरक्षित करना हो। या फिर देश, दुनिया और समाज की रक्षा का हो। कोरोना का प्रकोप साल 2020 में दुनिया के इतिहास के साथ मुंबई के लिए किसी भयानक सपने से कम नहीं है।

ऐसा ही खौफ साल 2008 में भी आया। जब 60 घंटे मुंबई महामारी नहीं बल्कि आतंक की मार से जूझ रहा था। हम बात कर रहे है 26/11 मुंबई हमले की। जी 5 की वेब सीरीज स्टेट ऑफ सीज 26/11 इसी खौफ, साहस और मनोबल को नई लय के साथ दिखाती है। यह सीरीज संदीप उन्नीथन की किताब ब्लैक टोर्नेडो पर आधारित है, जिसे हॉलीवुड के डायरेक्टर मेथिऊ ल्युटवायलर ने निर्देशित किया है। तीन चर्चित चेहरे अर्जुन बिजलानी, अर्जन बाजवा और विवेक दहिया एनएसजी कमांडो के किरदार में हैं। मुकुल देव आतंकवाद के मुखिया बने हैं।

मुंबई में हुए इस आतंकवादी हमले में 165 से अधिक मौत के साथ 300 घायल लोग आज भी उस दिन को याद कर सिहर जाते हैं। मुंबई पुलिस के हाथ से मामला निकलने के बाद नेशनल सिक्योरिटी गॉर्ड (एनएसजी) ने मुंबई को आतंक से रिहा करवाया था। एनएसजी कमांडो, पुलिस और मुंबई हमले के बीच जो 60 प्रमुख घंटे रहे हैं, उसे प्रभावी तौर से दिखाने का काम इस सीरीज ने किया है।

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26/11 की वो रात- आठ एपिसोड

आठ एपिसोड की ये सीरीज कहीं से भी लंबी या उबाऊ होती नहीं दिखेगी। बखूबी एडिटिंग और टू द पाइंट रखते हुए ये सीरीज उन 60 घंटों में लेकर जाती है, जिसका खौफ स्क्रीन से निकलकर आपके दिल तक जरूर पहुंचता है। पहले एपिसोड में कहानी पूरी तरह से पककर हमले की प्लानिंग, एनएसजी की देश सुरक्षा में खस्ताहाल से होते हुए 26/11 की रात पर पहुंचती है। जो आठ एपिसोड तक आपकी पकड़ बनाए रखने में सफल होती है।

बंधी हुई स्क्रिप्ट और कलाकार

बंधी हुई स्क्रिप्ट के साथ कलाकारों ने पूरी तरह से इंसाफ किया है। अर्जुन बिजलानी शहीद एनएसजी कमांडो मेजर संदीप उन्नीकृष्णन की भूमिका में इस सीरीज को अपने किरदार से उभारकर ले जाते हैं। अपनी अदायकी से अर्जुन ध्यान खींचते हैं। विवेक दहिया को टीवी पर मौका कम मिला है। वो साबित करते हैं कि बतौर एक्टर उनपर लोगों की नजर जाना क्यों जरूरी है। कम स्पेस में भी विवेक दहिया का किरदार याद रह जाता है।

एनएसजी और आतंकवाद

अर्जन बाजवा एनएसजी कमांडो की मुख्य ऑफिसर की भूमिका में सीरीज की पकड़ को मजबूत बनाते हैं। मुकुल देव आतंकवाद के मास्टर माइंड के किरदार में खौफनाक दिखे हैं। आतंकवादी की भूमिका में भी सभी कलाकारों का काम सराहनीय है। मनोहर वर्मा और रिंकू बच्चन ने बखूबी एक्शन सीन का डायरेक्शन किया है। खासकर आखिरी में ताज में हुई जंग को देखना दिलचस्प है। सीरीज एपिसोड दर एपिसोड कहीं पर भी अपनी लय नहीं खोती है।

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कमांडो कार्रवाई और डायलॅाग कसे हुए

रामगोपाल वर्मा की 26/11 और होटल मुंबई, इस हमले की दास्तान को दिखा चुके हैं। फिर भी ये सीरीज खुद को सफल तरीके से खड़ा करती है। पूरे हमले में एनएसजी कमांडो की भूमिका को ऊपरी परत पर रखकर दिखाना सीरीज की यूएसपी रही है। कमांडो कार्रवाई और मुंबई पुलिस की जाबाजी के कई सीन्स अच्छे बन पड़े हैं। मुकुल देव और आतंकवादियों के बीच के डायलॅाग कसे हुए हैं।

सिस्टम पर करारा तमाचा

हालांकि मुंबई हमले पर काफी कुछ पढ़ा और देखा जा चुका है कि मुंबईकर के लिए नया पन केवल एनएसजी कंमाडर के पूरे मिशन से मिलता है। एनएसजी कंमाडर का आना कहानी में उठाव लाता है। इस पूरे हमले के बीच एनएसजी कंमाडर की ट्रेनिंग सुविधाओं की कमी और जिस तरह उन्हें अनदेखा किया गया है वो सिस्टम पर करारा तमाचा है। जो एक सवाल छोड़ जाता है कि देश की रक्षा के लिए अभी भी पुलिस, कमांडर और सैनिकों के पास जरूरी सुविधाओं का अभाव क्यों है?

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देखने की वजह

बता दें कि ये सीरीज सिर्फ मुंबई हमले में आतंकवाद को नहीं दर्शाती बल्कि इंसानियत, जांबाजी के साथ मुंबई पुलिस की बहादुरी और एनएसजी कमांडो की देश सुरक्षा में खोती हुई अहमियत को भी समझाती है। फिल्मीबीट की तरफ से इसे 3 स्टार।

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